Biography

सुभाष चन्द्र बॉस का इतिहास और उनका जीवन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यूं तो कई नाम ऐसे रहें है जिन्हें इतिहास के पन्नों में अपनी अमिट पहचान के कारण जगह मिली। जिनके जीते जी उनका अस्तित्व सदा प्रजवल्लित होता रहा है पर जिनकी मौत एक रहस्य बनकर रह गई। एक अमीर बंगाली परिवार में जन्मे सुभाष चन्द्र बोस का जीवन किसी आम बच्चे की तरह नहीं बीता। राष्ट्रवाद की अग्नि उनके हदय में सदा जलती रही इसी का नतीजा रहा कि अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के समय 1916 में उन्हें राष्ट्रवादी गतिविधियां में संलिप्त पाए जाने के चलते निष्काषित कर दिया गया। 1919 में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उनके माता-पिता ने उन्हें सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने के लिए लंदन में कैब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। साल 1920 में सिविल सेवा की परीक्षा पास करने के बावजूद भी देश में आजादी के लिए होने वाली उथल-पुथल ने सदा उनका ध्यान अपनी ओर खींचे रखा। इसी का नतीजा रहा कि साल 1921 में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी से इस्तीफा दे दिया। साल 1921 में बोस पूरी तरह से राष्ट्रवादी गतिविधियों का हिस्सा बन गए। गांधी जी के निर्देशन में गैर सांप्रदायिक आंदोलन का हिस्सा बने तथा उन्ही के कहने पर उन्होंने बंगाल में एक राजनीतिज्ञ चित्तरंजन दास के अधीन रहकर काम किया। एक युवा क्र्रांतिकारी की तरह गतिविधियो को अंजाम देने के चलते बोस को 1921 में जेल में डाल दिया गया। साल 1924 में कलकत्ता नगर निगम का कार्यकारी अधिकारी नियुक्त होने के बाद बोस को कई क्र्रांतिकारी गतिविधियों में शक के चलते बर्मा भेज दिया गया जहां से साल  1927 में दास की मृत्यु होने के पश्चात वापस लौटते हुए बोस ने बंगाल की कमान अपने हाथ में संभालते हुए बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभाला। अपनी असाधारण प्रतिभा और आक्रोश के चलते जल्द ही उन्हें नेहरू के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। परन्तु ब्रिटिश शासन की नीतियों और जुर्म के खिलाफ पार्टी का इतना नर्म रवैया उन्हें रास नहीं आया और समझौतावादी, दक्षिणपंथी, गांधीवादी गुट वाली कांग्रेस में रहकर उन्होंने पार्टी के अधिक उग्रवादी, वामपंथी पक्ष का नेतृत्व किया। इसके अतिरिक्त 1930 में भगत सिंह को फांसी दिए जाने के समय बोस चाहते थे कि गांधी जी नर्मी छोड़ थोड़े सख्त रवैये से अंग्रेजो से बात करें। पर ऐसा न हो पाने के कारण बोस का नर्म दल के प्रति विश्वास सिमटता सा नजर आया।

साल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत की गई। बोस भी इस समय एक भूमिगत क्र्रांंतिकारी समूह के साथ जेल में रहते हुए बंगाल के मेयर चुने गए। बोस का व्यक्तित्व बचपन से ही राष्टवाद की जो परिभाषा जानता था उसमें हिंसा का स्थान अधिक था जिसके चलते उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। अपने खराब स्वास्थ्य के चलते उन्हें बाद में यूरोप जाने की इजाजत दी गई। वहां रहकर द इंडियन स्ट्रगल लिखी इस दौरान बोस ने इटली, आयरलैंड, के नेताओं से मिल उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मदद करने की अपील की। अपने आस्ट्रिया प्रवास के दौरान ही एमिली शेंकल नाम महिला के प्रति आकर्षित हुए सुभाष ने  साल 1942 में गास्टिन नामक स्थान पर हिंदू पद्धति से विवाह रचा लिया।1936 में अपने पिता की मृत्यु की सूचना मिलने पर भारत लौटे सुभाष को एक साल के कारावास की सजा सुनाई गईं। साल 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा में आयोजित 51 वे अधिवेशन में गांधी जी द्वारा सुझाए जाने के बाद बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। साल 1938 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड को कठिनाई में घिरा पाकर बोस चाहते थे कि इस अवसर का लाभ उठाए जाए और स्वतंत्रता आंदोलन को और तीव्र गति दी जाए लेकिन 1939 में कांग्रेस के नए अध्यक्ष के रूप में उन्हें ऐसा कोई नया व्यक्तित्व नजर नहीं आया जो इन फैसलो पर अडिग रह सकें और उन्होंने खुद ही इस पद पर बने रहने का फैसला किया। और 203 मतों से अध्यक्ष पद का चुनाव जीते। साल 1939 में अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल हुए लेकिन अपनी बात न मनवा पाने के और सदस्यों का साथ न मिलने के कारण उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। जिसका परिणाम यह रहा कि साल 1939 में ही कांग्रेस के अंदर रहते हुए उन्होंने फारॅवर्ड ब्लॉक नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। जिसके चलते कांग्रेस का विरोध का सामना करने के बाद यह पार्टी स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आई।

अपने विरोधी तेवर और आक्र्रोश रवैये कारण बोस ने कई घटनाओं को अंजाम दिया इसी के चलते उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई जहां आमरण अनशन पर बैठने के चलते उन्हें सरकार ने रिहा करते हुए उन्हीं के घर पर नजरबंद कर दिया वहां से वेश बदलकर फरार होते हुए वह काबुल के रास्ते जर्मनी तक पहुंचे। जहां उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिन्द रेडियों की स्थापना की ।साल 1943 में वह जर्मनी से पूर्वी एशिया के लिए निकल पडे, जहां भारत पहुंचकर उन्होंने रास बिहारी बोस के भारतीय स्वंतत्रता परिषद का नेतृत्व किया। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री का पद उन्होंने खुद ही संभाला।इसमें औरतों के लिए झांसी की रानी रेजिमेंट बनाई गई। इस फौज में युवाओं को भर्ती करने के लिए नेताजी ने कई प्रवाभी भाषणों का सहारा लिया। उनका नारा रहा तुम मुझे खुन दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा तथा उनके प्रोत्साहन के लिए दिल्ली चलां जैसे नारे दिए। 

द्वितीय विश्व यु़द्ध के समय आजाद हिन्द फौज व जापानी सेना की अंग्रेजो से हार के बाद वे नए रास्ते की तलाश करने के चलते रूस की तरफ अपने कदम बढ़ाते चले। जिसके कारण 18 अगस्त 1945 को वे हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ रवाना हुए। परन्तु इस सफर के दौरान नेताजी का जहाज लापता हो गया। वे उनकी मृत्यु लोगों के बीच रहस्य बनकर रह गई।

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