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यह है भारत का सबसे ऊंचा युद्ध स्थल, जहाँ होता है -70 डिग्री ठण्डा

Bharat ka sabse uncha yudh sthal

भारत हमेशा ही अपनी अखण्डता और विविधता को लेकर विश्व में अपनी एक अलग छवि बनाता हुआ नजर आता है। इसी में से एक है सियाचीन युद्ध स्थल। दुनिया की सबसे उंची युद्ध स्थली के रूप में मौजूद सियाचीन ग्लेशियर भारत का सिर पर ताज की तरह माना जाता है। जिसकी रक्षा करने के लिए हजारों सैनिक दिन रात अपनी जान की परवाह किए बिना मौजूद रहते हैं। रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से यह ग्लेशियर भारत के लिए काफी अहम माना जाता है। भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की तरफ से इस युद्ध स्थल पर अपना अधिकार जताया जाता रहा है यही कारण है कि सर्द मौसम में भी यहां हजारों की संख्या में सैनिक तैनात किए जाते हैं जिसके कारण उन्हें अपनी जान भी गंवानी पड़़ती है। दुनिया में सबसे ऊँचाई पर स्थित यह युद्धस्थल कश्मीर की सीमा से सटा हुआ है। इसलिए पाकिस्तान की तरफ से इसपर अपना अधिकार जताया जाता रहा है। यहां पर तैनात सैनिकों को सबसे ज्यादा नुकसान दुश्मन देश के कारण नहीं बल्कि यहां के मौसम के कारण होता है। सैनिकों के लिए जरूरी सामग्री यहां के फॉरवर्ड बेस पर हेलीकॉप्टर की मदद से पहुंचाई जाती है। भारत सियाचिन को अपने केन्द्र शासित प्रदेश लद्याख के लेह जिले के अधीन प्रशासित करता है। अक्सर पाकिस्तान की सेना द्वारा इस क्षेत्र पर विवाद उत्पन्न किए जाते रहें हैं जो आज भी जारी है। इसी के चलते 1984 में भारत द्वारा आपॅरेशन मेघदूत शुरू किया गया। जिसने सियाचीन ग्लेशियर के सभी उपदण्डों को भारत के नियंत्रण में कर लिया। हालांकि खराब मौसम के चलते हमारे कई सैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। पाकिस्तान ने भी साल 2003 और 2010 के बीच अपने 353 सैनिकों को खो दिया। वही 2012 में ग्यारी सेक्टर के हिमस्खलन में 140 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। ये भी चौकाने वाली बात होगी कि जिस क्षेत्र में अब हजारों की संख्या में भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की तरफ से हजारों की संख्या में सैनिक तैनात किए जाते हैं वहीं 1984 से पहलें किसी भी देश की सेना तैनात नहीं थी।

Bharat ka sabse uncha yudh sthal

यहां दोनों देशों के सैनिकों के अतिरिक्त कहने के लिए बहुत कम आबादी निवास करती है। भारतीय बेस शिविर से करीब दस मील की दूरी पर वार्सि गांव स्थित है। वो भी सीमित सड़क संपर्क के साथ मौजूद है। भारत के रणनीतिक लाभ के लिए इस जगह को बहुत ही जरूरी माना जाता रहा है। क्योंकि भारत सियाचीन ग्लेशियर के 76 किलोमीटर यानी सभी मुख्य भागों पर अपना नियंत्रण रखता है। यही कारण है कि मनाली-लेह-खर्दुगला- सियाचें्र मार्ग सहित सियाचिन क्षेत्र तक पहुचंने के लिए भारतीय सेना द्वारा कई विकास कार्यो को अंजाम दिया जा चुका है। इसी के चलते हमारे राजनेताओं द्वारा भी यह कहा जाता रहा है कि भारत कभी भी सियाचिन को खाली नहीं करेगा क्यांकि इसको लेकर पाकिस्तान पर हमारे विश्वास की कमी है। भारत ने साफ तौर पर कहा है कि भारत सियाचीन से 110 किलोमीटर लंबी एक्चुअल ग्राउंड पोजिशन लाइन को प्रमाणित करने के बाद अपनी सेना को नहीं हटाएगा। उसके बाद भी इसे चित्रित किया जाएगा और फिर उसका सीमांकन किया जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ही एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रहें जिन्होंने इस क्षेत्र का दौरा किया। सिंतबर 2007 के बाद भारत के क्षेत्र में सीमित पर्वतारोहण और ट्रेकिंग अभियानों को खोल दिया गया है। हालांकि, भारत का कहना है कि सियाचिन में ट्रेकर्स भेजने के लिए किसी की मंजूरी की जरूरत नहीं है।

सियाचीन की समस्या की शुरूआत 1972 में हुए युद्ध विराम के साथ हुई जहां शिमला समझोते के दौरान सियाचीन के एनजे 9842 स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय की गई थी लेकिन उसके बाद इस बिन्दु के आगे कई गतिविधियों को होते देखा गया। इसी के चलते 1985 में भारत की तरफ से आपॅरेशन मेघदूत शुरू किया गया और इस बिन्दु के आगे के हिस्से पर भारत ने अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। सियाचीन का मुख्य हिस्सा भारत के पास, कुछ हिस्सा पाकिस्तान तो कुछ चीन के पास भी है। एनजे-9842 ही दोनां देशों के मध्य लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा है।

ऐसा अनुमान लगाया गया है कि सियाचीन पर सेना की तैनाती करना दोनां ही देशों के लिए मंहगा सौदा साबित होता है। भारत की बात की जाए तो सैनिकों के रखरखाव में कम से कम चार करोड़ रूपये का खर्च होने की बात की गई है लेकिन ये शायद उन सैनिकों के जज्बे के आगे बहुत ही छोटी बात नजर आती है। कड़ाके की ठंड में सीमा पर डटे रहना देश की अखण्डता को बनाए रखने के लिए जान की बाजी लगाना इसके आगे कइ्र्र गुना ज्यादा है। हालांकि, मौसम की मार यहां किसी के रहने के अनुकूल नहीं साबित होती और सैनिक गतिविधियों का बंद होना ही दोनों देशों के हित में होगा लेकिन क्यांकि पाकिस्तान पर भरोसा हमारे लिए भरोसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है इसलिए आपसी विश्वास बढ़ाये बिना यह बात कल्पना में ही हमेशा नजर आती रहेगी।

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